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आगरा में सिंधिया राजघराने से जुड़ा है गोकुलपुरा का श्री सिद्धी विनायक मन्दिर

 

खुदाई के दौरान निकली थी प्रतिमा, 1760 में करायी गयी थी स्थापना
प्रस्तुति: महन्त पंडित मनीष शर्मा
आगरा। शहर में अकेले गणेश का विग्रह गोकुलपुरा राजामण्डी मौहल्ले में गणेश जी का एकमात्र ऐतिहासिक श्री सिद्धी विनायक मन्दिर हैं जिसकी प्रतिमा खुदाई के दौरान कुए से निकली थीे। इसकी स्थापना आज से लगभग 380 वर्ष पहले सम्वत 1700 (सन 1646 ई0) में की गई थी। महन्त श्री सिद्धी विनायक मन्दिर के महन्त पंडित मनीष शर्मा ने बताया कि मराठा सरदार महादाजी सिंधिया द्वारा पुन: जीर्ण उद्धार एवं मन्दिर की स्थापना सन 1760 में की गयी तथा मन्दिर में एक पीपल का वृक्ष भी लगाया। उन दिन वह ग्वालियर के शासक थे तथा आगरा प्रवास में उन्होनें डेरा गणेश मन्दिर की स्थापना की। जो कालान्तर में सिद्धी विनायक के नाम से लोकप्रिय हो गया। कालान्तर में ग्वालियर राज्य के विस्तार के साथ महादाजी सिन्धिया की ओर से इस मन्दिर की देखभाल तथा नियमित खर्च (सेवा-पूजा) के लिए आठ आना प्रतिदिन का आज्ञा पत्र (सनद) मराठा शासन के नाम जारी किया गया मन्दिर के पुजारी के पास ऐतिहासिक धरोहर आज भी सुरक्षित है।
गुजराती (नागर) और मराठा परिवारों की आस्था के केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित इस मन्दिर में अपने आगरा प्रवास के दौरान ग्वालियर नरेश महादजी सिंधिया नियम पूर्वक अपनी उपस्थिति में पूजन-अर्चन कराते रहे। उन्होनें ही चतुर्थी के दिन शाही संरक्षण में धूमधाम के साथ गणेश शोभायात्रा की शुरूआत कराई जो सन 1860 तक जारी रही तथा एक हमले के कारण बन्द होने के बाद भारत की स्वतंत्रता के उदय के साथ सन 1959 में पुन: प्रारम्भ हुई तथा एक परम्परा के रूप में यथावत हैं सम्भवत: आगरा में गणेशोत्सवों की परम्परा में यह सबसे प्राचीन धर्म स्थल है।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का महत्व: इस तिथि को विशिष्ट रूप से श्री गणेश जी के आयोजन मनाये जाते हैं। यह तिथि अनेक दृष्टियों में महत्वपूर्ण है। श्री गणेश जी का जन्म भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को ही हुआ था। तब भगवान शिव के कैलाश पर्वत पर इसी जन्मोत्सव को मनाने का आयोजन किया था। सिन्दूर दैत्य पर भी श्री गणेश जी ने इसी तिथि को विजय प्राप्त की थी। इसलिए भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पर पार्थिव पूजन का विधान है। इस चतुर्थी को डांडिया चतुर्थी के भी नाम से जाना जाता है तथा छोटे बच्चों द्वारा डांडिया का पूजन कराया जाता है तथा पट्टी पूजन भी कराया जाता है।
चन्द दर्शन क्यों नहीं: इस व्रत के गंभीर आध्यात्मिक उद्देश्य हैं चतुर्थी का अभिप्राय: जागृति स्वप्न, सुशुप्ति के उस पार की तुरीय अवस्था से लिया जाता है जिसे जीवन का अन्तिम लक्ष्य माना जाता है उस दिन चन्द्र दर्शन को निषेध माना जाता है। क्योंकि चन्द्र मन की सन्तप्ति है। आध्यात्मिक क्षेत्र में उसे मन का प्रतीक और पयार्वाची माना जाता है जब मन असंयमित होता है तो किसी भी आध्यात्मिक साधना में प्रगति नहीं हो सकती। मन का विग्रह है सभी शुद्धियों का श्रृल माना जाता है। अत: सभी साधनायें इसी पर ही केन्द्रित रहती है। इस पर विजय प्राप्त किये बिना तुरीय अवस्था तक पहुंचना असम्भव है। आज के दिन बच्चों का पट्टी पूजन शिक्षा का श्री गणेश भी होता है। इसलिए बच्चों का चन्द्रमा मन एकाग्रता प्राप्त करें। इस दिन चन्द्र दर्शन न किया जाये। अर्थात मन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाये अथवा मौनवस्था की ओर लाया जाये तो लक्ष्य की प्राप्ति में सुविधा होगी।

गणपति के अचूक उपाय

लक्ष्मी प्राप्ति के लिए: कमल गट्टे की माला चढ़ायें। मनोकामना पूर्ति के लिए: नारियल चढ़ायें व सिन्दूर अर्पित करें। विद्या प्राप्ति व परीक्षा में सफलता के लिए: घी व गुड़ चढ़ायें। कर्ज से मुक्ति के लिए: खीर व कमल के फूलों की माला चढ़ायें। विवाह कामना के लिए: हल्दी की 7 गांठे पीले चावल व पीली मिठाई चढ़ायें। सन्तान प्राप्ति की कामना हेतु: तिल से बनी मिठाई व पान का बीड़ा चढ़ायें। सुख शान्ति एवं समृद्धि हेतु : मोदक व दुर्वा चढ़ाये। व्यापार में वृद्धि व वैभव हेतु: शमी के 5 पत्ते व पीले रंग का पीताम्बर अर्पित करें। रोग मुक्ति हेतु: हरे मूंग व गुड़ चढ़ायें व घी की 8 बत्ती का दीपक जलायें।

गणेश जी की स्थापना का शुभ महूर्त
14-09-2026 को प्रात: सुबह 11:02 से दोपहर 1:31 तक।
अभिजीत मुहूत : 12:09 से 12:58 तक। चतुर्थी तिथि 14 सितम्बर 2026 को सुबह 7:06 से प्रारम्भ होकर 15 सितम्बर 2026 को सुबह 7:44 तक रहेगी ।
साल 2026 में हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिसके तहत ये दोनों ही पावन पर्व एक ही दिन 14 सितंबर 2026 को मनाए जाएंगे।
इस दिन सूर्योदय के समय तृतीया तिथि और मध्याह्न काल में चतुर्थी तिथि का संयोग रहेगा।
स्थापना की विधि
पीत वस्त्र पर चावल का स्वास्तिक बनाकर उस पर गणेश जी स्थापित करें। फिर पंचोपचार व षोडषाचार पूजन करें।
गणेश जी पर विशेष रूप से हरी दुर्वा चढ़ायें, घी का दीपक जलायें, मोदक पंच मेवा व पाँच फलों का भोग लगायें, नारियल, ताम्बुल व सुपारी चढ़ायें।

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