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भारतीय सेना से रिटायर हुईं कर्नल सीमा सिंह:स्थायी कमीशन की कानूनी लड़ाई लड़ी, ऑपरेशन सिंदूर में पठानकोट में सेवा दी

यूपी के प्रयागराज की रहने वाली कर्नल सीमा सिंह 1 अक्टूबर 2026 को सैन्य जीवन को अलविदा कह दिया। सैन्य सफर की एक खास बात उनका वह संघर्ष भी रहा, जिसकी शुरुआत दिसंबर 2006 में हुई थी। कर्नल सीमा सिंह के मुताबिक, उनका यह संघर्ष कभी भी भारतीय सेना या अपने साथी अधिकारियों के खिलाफ नहीं था। कर्नल सीमा सिंह का उद्देश्य उन नीतियों और व्यवस्थाओं में बदलाव की मांग करना था, जिनकी वजह से महिला अधिकारियों को अपने पुरुष समकक्षों के मुकाबले भेदभाव और असमान अवसरों का सामना करना पड़ता था। उनका मानना था कि महिला अधिकारियों को उनकी योग्यता और क्षमता के आधार पर समान अवसर मिलना चाहिए, क्योंकि काबिलियत जेंडर की मोहताज नहीं होती। यही सोच उनके लंबे कानूनी संघर्ष का आधार बनी और आगे चलकर महिला अधिकारियों के लिए स्थायी कमीशन तथा कमान से जुड़े अवसरों की बहस में भी महत्वपूर्ण संदर्भ बनी। भारतीय सेना में वर्षों तक सेवा देने के बाद कर्नल सीमा सिंह ने उनकी विदाई केवल एक सैन्य अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्ति नहीं है, बल्कि यह उस लंबे सफर का पड़ाव भी है, जिसमें उन्होंने नेतृत्व की जिम्मेदारी निभाने के साथ महिला अधिकारियों के लिए समान अवसर और स्थायी कमीशन की लड़ाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब वर्दी के साथ अधिकारों की लड़ाई भी बनी मिशन कर्नल सीमा सिंह उन महिला अधिकारियों में शामिल रही हैं, जिन्होंने भारतीय सेना में महिलाओं के करियर से जुड़े अवसरों और स्थायी कमीशन के मुद्दे को लेकर लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ी। इस संघर्ष की शुरुआत उस दौर में हुई, जब महिला अधिकारियों के लिए करियर की संभावनाएं आज की तुलना में कहीं अधिक सीमित थीं। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने 11 शॉर्ट सर्विस कमीशन महिला अधिकारियों को बहाल करने का निर्देश दिया था। इनमें उस समय मेजर रैंक पर रहीं सीमा सिंह भी शामिल थीं। यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट के 2010 के स्थायी कमीशन से जुड़े फैसले के खिलाफ सेना की अपील के बीच आगे बढ़ा। सालों की लड़ाई पहुंची सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले तक सीमा सिंह और अन्य महिला अधिकारियों ने इस मुद्दे को आगे भी उठाया। वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया का एक अहम पड़ाव फरवरी 2020 में आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारियों के लिए स्थायी कमीशन और कमान से जुड़े अवसरों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। उस समय की रिपोर्टों में लेफ्टिनेंट कर्नल सीमा सिंह का नाम इस लंबे समय से चल रहे मामले की याचिकाकर्ताओं में शामिल था। फैसले के बाद सीमा सिंह ने इसे सेना में लैंगिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उन शाखाओं में पात्र महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों के लिए स्थायी कमीशन के अवसर का रास्ता स्पष्ट किया, जहां महिलाएं पहले से सेवा दे रही थीं। इसके साथ ही महिला अधिकारियों को कमान की जिम्मेदारियों के लिए विचार किए जाने का रास्ता भी मजबूत हुआ। कोर्टरूम से कमांड तक, नेतृत्व की दूसरी तस्वीर सीमा सिंह की भूमिका केवल कानूनी लड़ाई तक सीमित नहीं रही। सेना में अपनी जिम्मेदारियों के दौरान उन्होंने ऑर्डनेंस यूनिट की कमांडिंग ऑफिसर के रूप में सैनिकों और कर्मचारियों का नेतृत्व किया। उनके नेतृत्व में यूनिट के प्रदर्शन को लेकर सेवानिवृत्ति के अवसर पर आयोजित विदाई समारोह में भी उल्लेख किया गया। विदाई श्रद्धांजलि के अनुसार उनकी कमान के दौरान यूनिट को दो प्रशस्तियां मिलीं। इस तरह उनकी सैन्य यात्रा के दो महत्वपूर्ण पहलू सामने आते हैं, एक ओर संगठन के भीतर कमान संभालने वाली अधिकारी और दूसरी ओर ऐसी महिला अधिकारियों के समूह का हिस्सा, जिन्होंने संस्थागत बदलाव के लिए कानूनी रास्ता अपनाया। ‘समानता’ की मांग से बदलाव की कहानी तक 2020 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद प्रकाशित विभिन्न रिपोर्टों में उस लंबे संघर्ष का जिक्र किया गया, जिसमें सीमा सिंह और उनकी साथी अधिकारियों ने अपने मामले को आगे बढ़ाया। इस दौरान उन्होंने अपनी सैन्य और व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को भी जारी रखा। सीमा सिंह ने यह स्पष्ट किया था कि उनकी मांग पुरुष अधिकारियों के मुकाबले समान अवसर और समानता की थी, न कि संस्था या अपने पुरुष सहकर्मियों के खिलाफ किसी टकराव की। मेजर सीमा सिंह के रूप में स्थायी कमीशन की शुरुआती कानूनी लड़ाई से लेकर कर्नल के पद तक पहुंचने और एक ऑर्डनेंस यूनिट की कमान संभालने तक का उनका सफर उस दौर में महिला अधिकारियों के लिए बदलते अवसरों की भी कहानी कहता है। वर्दी उतरी, लेकिन विरासत कायम रही सेवानिवृत्ति के साथ कर्नल सीमा सिंह अब सेना की सक्रिय सेवा से बाहर हो गई हैं। उनके विदाई संदेशों में साहस, दृढ़ विश्वास, संवेदनशीलता और अपने विचारों के लिए खड़े होने जैसे गुणों का उल्लेख किया गया। उनकी विरासत केवल उन सैनिकों और यूनिट तक सीमित नहीं रहेगी, जिनका उन्होंने नेतृत्व किया, बल्कि भारतीय सेना में महिला अधिकारियों के अधिकारों और अवसरों से जुड़े एक महत्वपूर्ण अध्याय के साथ भी उनका नाम जुड़ा रहेगा। उनकी कहानी यह दिखाती है कि सैन्य सेवा की भूमिका केवल मैदान या कमान तक सीमित नहीं होती। कभी नेतृत्व सैनिकों के बीच दिखाई देता है और कभी किसी व्यवस्था में बदलाव के लिए संस्थागत रास्ते पर लगातार आगे बढ़ने के रूप में। कर्नल सीमा सिंह की यात्रा इसी व्यापक नेतृत्व की एक मिसाल के तौर पर याद की जाएगी।

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