वाइल्डलाइफ़ एसओएस ने एक ही दिन में तीन रेप्टाइल्स को बचाया
भीषण गर्मी के कारण विस्थापित हो रहे वन्यजीव
बाबा न्यूज
आगरा। एक ही दिन कॉलेज कैंपस, पार्किंग में लगी स्कूटी और ज़िला एवं सत्र न्यायालय के पूर्व जज के घर से तीन सरीसृपों (रेप्टाइल्स) को बचाया। इन घटनाओं से पता चलता है कि बढ़ता तापमान जंगली जानवरों को छाया और आश्रय की तलाश में शहरों की ऐसी जगहों पर आने के लिए मजबूर कर रहा है, जहाँ वे आम तौर पर नहीं आते। वाइल्डलाइफ़ एसओएस रैपिड रिस्पॉन्स यूनिट ने शहर में अलग-अलग जगहों से एक इंडियन रैट स्नेक और दो बंगाल मॉनिटर लिज़र्ड को बचाया। स्वस्थ पाए जाने पर टीम ने उन्हें उपयुक्त जंगल में छोड़ दिया।
पहला रेस्क्यू ऑपरेशन आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज में किया गया, जहाँ स्टाफ़ ने कैंपस में पानी की टंकी के पास एक इंडियन रैट स्नेक को आराम करते हुए देखा। पेशेवर मदद की ज़रूरत को समझते हुए, उन्होंने तुरंत वाइल्डलाइफ़ एसओएस हेल्पलाइन (+91 9917109666) को सूचित किया। इसके बाद, रैपिड रिस्पॉन्स यूनिट ने साँप को सुरक्षित रूप से बाहर निकाला और यह जाँचने के बाद कि वह घायल नहीं है, उसे जंगल में छोड़ दिया।
उसी दिन बाद में, आगरा की एक हाउसिंग कॉलोनी के लोगों ने हेल्पलाइन पर संपर्क किया। उन्होंने देखा कि तेज़ गर्मी से बचने के लिए मॉनिटर लिज़र्ड (गोह) वहाँ खड़ी एक स्कूटी के अंदर छिप गई थी। स्थानीय लोग घबराए हुए थे और कोई मैकेनिक स्कूटी के पास जाने को तैयार नहीं था, इसलिए वाइल्डलाइफ़ एसओएस की रेस्क्यू टीम ने खुद ही स्कूटी के ज़रूरी हिस्सों को सावधानी से खोला और उसे सुरक्षित बाहर निकाला; वह पूरी तरह स्वस्थ पाई गई।
दिन का तीसरा रेस्क्यू आगरा में डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट के पूर्व जज के घर से किया गया, जहाँ एक बंगाल मॉनिटर लिज़र्ड ने परिसर की छायादार जगह में पनाह ले रखी थी। सूचना मिलने पर, रेस्क्यू टीम तुरंत मौके पर पहुँची और उसे सुरक्षित रूप से रेस्क्यू कर दूसरी जगह रिलीज़ किया।
इंडियन रैट स्नेक और बंगाल मॉनिटर लिज़र्ड, दोनों ही वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के तहत संरक्षित हैं। यह भारत में वन्यजीवों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का सबसे ऊँचा स्तर है। रैट स्नेक ज़हरीले सांप नहीं है, और खेती-बाड़ी वाले इलाकों और शहरों में चूहों की आबादी को कंट्रोल करने में अहम भूमिका निभाते हैं। मॉनिटर लिज़र्ड को कम होते जंगल और गैर-कानूनी व्यापार से बढ़ते खतरों का सामना करना पड़ रहा है।
वाइल्डलाइफ़ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ, कार्तिक सत्यनारायण ने कहा, “मॉनिटर लिज़र्ड (गोह) और रैट स्नेक जैसे सरीसृप हमारे इकोसिस्टम का ज़रूरी हिस्सा हैं, फिर भी शहरी इलाकों में लोग इनके बारे में गलतफहमी पालते हैं और इनसे डरते हैं। इन तीनों मामलों में अच्छी बात यह रही कि लोगों ने ज़िम्मेदारी भरा व्यवहार दिखाया; उन्होंने घबराने या जानवरों को नुकसान पहुँचाने के बजाय प्रोफ़ेशनल मदद लेना बेहतर समझा।”
वाइल्डलाइफ़ एसओएस के कंजर्वेशन प्रोजेक्ट्स के डायरेक्टर, बैजूराज एम.वी ने कहा, “बढ़ते तापमान की वजह से रेंगने वाले जीव (रेप्टाइल्स) गर्मी से राहत और छाया की तलाश में गाड़ियों, कंपाउंड की दीवारों और संस्थानों के परिसरों जैसी असामान्य जगहों पर आ जाते हैं। इन रेस्क्यू से पता चलता है कि जानवर भी भीषण गर्मी से प्रभावित होते हैं, और लोगों की शांत और समझदारी भरी प्रतिक्रिया जानवर के बचने में बहुत बड़ा अंतर ला सकती है।”

