ATS करेगी मदरसों की पांचवीं जांच, बोले मौलाना- स्वागत है:उत्तराखंड सरकार का मदरसा बोर्ड खत्म करने का फैसला संविधान के खिलाफ
बरेली में ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रज़वी बरेलवी ने मदरसों की जांच और उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म किए जाने के फैसले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद अब पांचवीं बार मदरसों की जांच कराई जा रही है। इस बार जांच की जिम्मेदारी ATS को दी गई है। उन्होंने कहा कि मदरसा प्रबंधन जांच में पूरा सहयोग करेगा, लेकिन उत्तराखंड सरकार का मदरसा बोर्ड खत्म करने का फैसला संविधान के खिलाफ है। ATS जांच का स्वागत, सभी रिकॉर्ड दिखाने को तैयार
मौलाना शहाबुद्दीन रज़वी ने कहा कि पहले भी मदरसों की कई बार जांच हो चुकी है और हर बार मदरसा संचालकों ने जांच एजेंसियों का सहयोग किया है। अब ATS को जांच की जिम्मेदारी दी गई है तो उसका भी स्वागत है। उन्होंने कहा कि ATS अधिकारी जब भी मदरसों में आएंगे, उन्हें सभी जरूरी दस्तावेज, रजिस्टर और कानूनी रिकॉर्ड उपलब्ध कराए जाएंगे। मदरसों का पूरा लेखा-जोखा पारदर्शी है और किसी भी तरह की जानकारी छिपाई नहीं जाएगी। हाईकोर्ट ने जांच पर रोक लगाने से किया इनकार
मौलाना ने बताया कि ATS जांच के खिलाफ कुछ मदरसा संगठनों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन कोर्ट ने जांच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अदालत के फैसले के बाद जांच का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है और मदरसे कानून के दायरे में रहकर जांच में सहयोग करेंगे। उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म करने का किया विरोध
उत्तराखंड सरकार द्वारा मदरसा बोर्ड समाप्त किए जाने के फैसले पर मौलाना ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह फैसला संविधान की भावना के खिलाफ है। उनका दावा है कि संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत अल्पसंख्यकों को अपने धार्मिक और शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका संचालन करने का अधिकार प्राप्त है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अल्पसंख्यकों को शिक्षा से दूर रखने की कोशिश कर रही है और इसी वजह से मदरसा बोर्ड खत्म किया गया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में करीब 250 मदरसों पर ताले लगा दिए गए हैं। भाषाओं को बढ़ावा देने की बजाय खत्म करने की कोशिश का आरोप
मौलाना ने कहा कि देश में हिंदी, सिंधी, उर्दू और अरबी-फारसी जैसी भाषाओं के संरक्षण और विकास के लिए समय-समय पर सरकारों ने अकादमियां और बोर्ड स्थापित किए थे। उनका आरोप है कि अब उर्दू और अरबी जैसी भाषाओं को कमजोर करने वाली नीतियां अपनाई जा रही हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। क्या बोले मौलाना शहाबुद्दीन
उत्तर प्रदेश में जब से भाजपा की गवर्नमेंट बनी है, तब से चार मर्तबा मदरसों की जांच के आदेश दिए गए। और अब पांचवीं बार एटीएस से जांच कराने का आदेश दिया गया है। और उस एटीएस के आदेश को लेकर के मदरसा अरेबिया एसोसिएशन के लोग इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचे और वहां इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जांच को बरकरार रखा। बहरहाल, हम यानी मदरसे के लोग, मदरसा कमेटी प्रबंधन, एटीएस से जांच कराने के लिए तैयार हैं। जब हमने चार बार जांच करा दी, तो पांचवीं बार भी हमें जांच से कोई घबराहट या कोई परेशानी या कोई आपत्ति नहीं है।
हम एटीएस के अधिकारियों का स्वागत करते हैं, वो मदरसे में तशरीफ लाएं, जब चाहें आएं और जिस तरीके से पेपर चाहेंगे, जिस तरीके से रिकॉर्ड हमारा देखना चाहेंगे, हम मुकम्मल तरीके से कोऑपरेशन करने के लिए तैयार हैं। और चूंकि मदरसे एकदम बिल्कुल खुली किताब की तरह हैं, हमारे पास छुपाने के लिए कुछ नहीं है, हर चीज दिखाने के लिए है। और मदरसे बिल्कुल आईने की तरह साफ-ओ-शफ्फाफ हैं।
हां ये जरूर है कि ये जांच अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी द्वारा कराई जानी चाहिए, चूंकि जो मदरसे हैं, वो अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधीन हैं और यही जानते हैं मदरसों का रखरखाव, तौर-तरीका। इसलिए बेहतर ये होता कि अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी के किसी अधिकारी द्वारा कराई जाती, कमेटी गठित करके कराई जाती। मगर ये न करके एटीएस से कराने का जो फैसला किया, कि फंडिंग की जांच होगी, जमीन के पेपर की जांच होगी और एफसीआरए की कहा जा रहा है कि फॉरेन फंडिंग की भी जांच होगी, हर तरीके से जांच करें, हम जांच में सहयोग करेंगे।
और वहीं दूसरी तरफ उत्तराखंड हुकूमत ने मदरसा एजुकेशन बोर्ड उत्तराखंड को खत्म कर दिया है। ये संविधान के खिलाफ काम करना हुआ। संविधान में आर्टिकल 25 के तहत कहा गया है कि हर अल्पसंख्यक व्यक्ति को इस बात का अधिकार हासिल है कि वो अपनी संस्थाएं खोले और उसका संचालन करे। और 1933 में एक कानून बना कि भारत में जितनी भाषाएं हैं उनको बढ़ावा देने के लिए बात की जाएगी, फिर उसको अमली जामा पहनाने के लिए 1948 में कानून बनाया गया। उसी के मातहत सेंट्रल हुकूमत, स्टेट हुकूमतों ने उर्दू एकेडमी, हिंदी एकेडमी, सिंधी एकेडमी, साहित्य एकेडमी, संस्कृत बोर्ड बनाए, संचालन किए। मदरसा बोर्ड उत्तराखंड खत्म करने का मतलब यह है कि अल्पसंख्यकों को शिक्षा से वंचित रखा जा रहा है।

