कानपुर में जश्ने मख़दूम शाह आला का आयोजन:हज़रत मख़दूम शाह आला ने दिया अद्ल, इंसाफ और मोहब्बत का पैग़ाम
कानपुर के गद्दियाना स्थित मदरसा अलजामिअतुल इस्लामिया अशरफ़ुल मदारिस में रविवार शाम 5:30 बजे जश्ने मख़दूम शाह आला का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम ग़ाज़ी-ए-इस्लाम हज़रत मौलाना मुहम्मद हाशिम अशरफ़ी की सरपरस्ती में हुआ। इसमें उलमा, अकीदतमंद और दरगाह से जुड़े लोग शामिल हुए। मौलाना अशरफ़ी ने बताया कि हज़रत मख़दूम शाह आला का 768वां उर्स आगामी बुधवार को जाजमऊ शरीफ़ में अकीदत और एहतराम के साथ मनाया जाएगा। कुल शरीफ़ की तक़रीब सुबह 11 बजे शुरू होगी। ‘मखदूम शाह आला ने पूरा जीवन सच्चाई-इंसानियत को समर्पित किया’ मौलाना अशरफ़ी ने इस अवसर पर कहा कि हज़रत मख़दूम शाह आला ने अपना जीवन न्याय, सच्चाई, इंसानियत और प्रेम का संदेश फैलाने में समर्पित किया। उन्होंने बताया कि हज़रत शैख़ अलाउद्दीन वल्दीन मुहम्मद यूसुफ़ शैख़ज़ादा फ़ारूक़ी, जिन्हें हज़रत मख़दूम शाह आला के नाम से जाना जाता है। इनका जन्म 21 रमज़ानुल मुबारक 528 हिजरी (21 जुलाई 1134 ईस्वी) को ज़ंजान, ईरान में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा के बाद, उन्होंने बग़दाद शरीफ़ में क़ुरआन, हदीस, फ़िक़्ह, तफ़सीर, अदब और तारीख़ सहित विभिन्न इस्लामी विषयों की शिक्षा प्राप्त की। बग़दाद में उन्हें हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती हसन संजरी अजमेरी से भी मुलाकात का अवसर मिला। बाद में ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ ने उन्हें ख़िलाफ़त व इजाज़त से सम्मानित किया। हज़रत मख़दूम शाह आला को ख़िलाफ़त-ए-सुहरवर्दिया और ख़िलाफ़त-ए-क़ादरिया भी प्राप्त थी। मौलाना अशरफ़ी के अनुसार, अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वे ज़ंजान से हिंदुस्तान आए और जाजमऊ शरीफ़ को अपनी कर्मभूमि बनाया। उन्होंने ज़ुल्म, भेदभाव और नफ़रत के खिलाफ़ सच्चाई, न्याय और प्रेम का संदेश फैलाया। लगभग 60 वर्षों तक जाजमऊ में रहकर उन्होंने लोगों को भाईचारे और इंसानियत का पाठ पढ़ाया। उनका विसाल 27 सफ़र 657 हिजरी (22 फ़रवरी 1259 ईस्वी) को हुआ, जब उनकी आयु 125 वर्ष बताई जाती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता सज्जादानशीन अदनान राफ़े साहब फ़ारूक़ी ने की। इस दौरान साहिब-ए-सज्जादा और दरगाह कमेटी के पदाधिकारियों का फूल-मालाओं से स्वागत किया गया। हाफ़िज़ मिन्हाजुद्दीन क़ादरी ने तिलावत की, जबकि मुहम्मद हसन शैली अशरफ़ी और क़ारी मुहम्मद अहमद अशरफ़ी ने नात व मनक़बत प्रस्तुत की। सलात व सलाम के बाद देश में शांति, प्रगति और खुशहाली के लिए दुआ की गई और अंत में तबर्रुक वितरित किया गया।

