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इंदिरा की हत्या के बाद से दहशत में रहीं सोनिया:बोलीं- हमेशा डर लगा रहता कि अगला नंबर राजीव का होगा; 1991 में हत्या हुई थी

इंदिरा की हत्या के बाद घर किला बन गया। कमांडो बच्चों के बेडरूम में तैनात थे। राहुल-प्रियंका को स्कूल से निकाल लिया गया। डर बहुत था, अक्सर ख्याल आता कि अगला नंबर राजीव का ही होगा, वो मारे जाएंगे। 1991 में यही डर सच साबित हुआ। लिट्टे के आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की हत्या हो गई। सोनिया गांधी ने गार्जियन को दिए इंटरव्यू में यह बात कही। उन्होंने अपनी आने वाली किताब ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ पर राजीव की हत्या समेत निजी और राजनैतिक मुद्दों पर अपने विचार और अनुभव शेयर किए हैं। सोनिया बताती हैं- ‘राजीव को मौत की धमकियां मिल रही थीं। भारतीय खुफिया एजेंसियों यह बात जानती थीं, लेकिन नई सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया। उनकी सिक्योरिटी हटा ली गई। मुझे नहीं लगता कि अब हमें कभी सच का पता चल सकेगा।’ इसी इंटरव्यू में सोनिया ने अपनी और राजीव की लवस्टोरी पर भी बात की है। उन्होंने बताया कि उस वक्त उन्हें नहीं पता था कि राजीव भारत के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार के वारिस हैं। सोनिया ने इन मुद्दों पर बात की… इंदिरा गांधी – घर में मां, बाहर आयरन लेडी: 1968 में भारत आने पर सोनिया और राजीव, इंदिरा गांधी के साथ ही रहने लगे। बाहर से इंदिरा सख्त ‘आयरन लेडी’ दिखती थीं, लेकिन सोनिया कहती हैं घर में वो बिल्कुल आम मां थीं। अखबारों में उन्हें सख्त या कठोर दिखाया जाता था, लेकिन घर में वो किसी भी दूसरी मां जैसी थीं। सोनिया के मुताबिक इंदिरा गुस्सा भी खूब करती थीं। किताब में एक किस्सा है जिसके मुताबिक इदिरा ने फैमिली डिनर में गुस्से में अपनी थाली टेबल के पार फेंक दी थी। सोनिया के मुताबिक इंदिरा ने एक बार उन्हें बताया था कि पहली बार प्रधानमंत्री बनने पर डरी हुई थीं। इमरजेंसी को लेकर परिवार में मतभेद थे: 1975 में इमरजेंसी के फैसले पर परिवार बंटा हुआ था। राजीव इसके खिलाफ थे। उन्होंने मां से कहा था कि अगले चुनाव का इंतजार करो। लेकिन संजय गांधी इमरजेंसी के पक्ष में थे। एक फैमिली डिनर में संजय ने कहा था – “विपक्ष मां को बर्बाद कर देगा, उन्हें रोका जाना चाहिए।” सोनिया किताब में लिखती हैं, “संजय को काबू में रखने से बाद में हुए बहुत से नुकसान को रोका जा सकता था।” सोनिया कहती हैं इमरजेंसी लगाना गलती थी और इंदिरा गांधी भी बाद में यही महसूस करती थीं। “मुझे हमेशा लगता है कि श्रीमती गांधी दिल से लोकतांत्रिक थीं। मुझे पता है कि कई लोग इस पर हंसेंगे, लेकिन मेरा मानना है कि इमरजेंसी के दौरान वो कभी सहज नहीं थीं। ये बात उन पर भारी पड़ रही थी।” 31 अक्टूबर 1984 – वो खून से लथपथ शरीर: सोनिया उस दिन घर पर थीं जब पटाखों जैसी आवाज सुनाई दी। बगल के ऑफिस में दौड़कर गईं तो इंदिरा गांधी का गोलियों से छलनी शरीर जमीन पर पड़ा था। उन्हें उनके ही सिख बॉडीगार्ड्स ने गोल्डन टेंपल पर ऑपरेशन का बदला लेने के लिए गोली मारी थी। अस्पताल तक की ड्राइव के बारे में सोनिया कहती हैं, “घर से अस्पताल तक की ड्राइव असहनीय थी। ट्रैफिक ज्यादा नहीं था, लेकिन वो बहुत धीमी लगी। मैं ये भी जानती थी कि क्योंकि वो बोल नहीं रही हैं, तो सब खत्म हो चुका है।” इंदिरा की मौत के बाद राजीव से जब प्रधानमंत्री बनने को कहा गया तो सोनिया ने उन्हें राजनीति से दूर रहने की भीख मांगी थी। बाबरी विध्वंस – टीवी देखकर रोईं: दिसंबर 1992 में जब अयोध्या में मस्जिद गिराई गई, तो सोनिया ने उसे टीवी पर देखा और रो पड़ीं। उन्होंने कहा, “तब मुझे पता चला कि हमें उस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए लंबी लड़ाई लड़नी होगी, जिसे महात्मा गांधी, नेहरू और उनके साथियों ने बनाने की कोशिश की थी।” वो ये भी मानती हैं कि कांग्रेस की आत्मसंतुष्टि ने BJP और उसके कट्टर हिंदुत्व की राजनीति के उदय में मदद की। वे कहती हैं- मुझे लगता है हम कई मायनों में बहुत आत्मसंतुष्ट हो गए थे। एक तरह का लापरवाह रवैया था।
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सोनिया ने बताया, 2004 में क्यों ठुकराया था PM पद:बोलीं- राहुल और प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि मैं प्रधानमंत्री बनूं 2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराने का फैसला सोनिया गांधी की जिंदगी के सबसे चर्चित राजनीतिक फैसलों में से एक रहा है। अपनी किताब ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ में उन्होंने बताया है कि राहुल और प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि वे प्रधानमंत्री बनें। पूरी खबर पढ़ें…

कांग्रेस का चंदा एक साल में 75% घटा:2025-26 में ₹130.69 करोड़ मिले; यह 10 साल में सबसे कम

कांग्रेस पार्टी को 20 हजार रुपए से ऊपर के चंदे से मिलने वाली रकम में करीब 75% की कमी आई है। 2025-26 में पार्टी को 130.69 करोड़ रुपए का चंदा मिला, जबकि 2024-25 में ये आंकड़ा 517.39 करोड़ रुपए था। चुनाव आयोग को सौंपी गई पार्टी की फाइलिंग के विश्लेषण से यह बात सामने आई है। यह पिछले एक दशक में पार्टी के चंदे में सबसे तेज गिरावट है। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, कमी की बड़ी वजह प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट से मिले फंड का कम होना है। इससे बड़ी गिरावट 2015-16 में आई थी, जब कांग्रेस का घोषित चंदा 86% गिरकर 141.46 करोड़ रुपए रह गया था। पिछले 6 साल में कांग्रेस को मिला चंदा 2025-26 में कांग्रेस का घोषित चंदा पिछले साल से काफी कम रहा। हालांकि, जांचे गए पूरे समय में यह पार्टी का सबसे कम चंदा नहीं है। मौजूदा आंकड़ों में इलेक्टोरल बॉन्ड शामिल नहीं हैं। योजना लागू रहने के दौरान बॉन्ड से मिली रकम अलग से बताई जाती थी। बॉन्ड से मिली रकम को पुराने वर्षों में जोड़ने पर 2025-26 का कांग्रेस का चंदा 2020-21 के बाद सबसे कम रहा। प्रूडेंट ट्रस्ट का डोनेशन घटा, इसका असर पड़ा कांग्रेस के चंदे में ताजा गिरावट में प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट की बड़ी भूमिका रही। ट्रस्ट का योगदान 2024-25 के ₹216.34 करोड़ से घटकर 2025-26 में ₹25 करोड़ रह गया। इसमें करीब 88% की गिरावट हुई। कांग्रेस की ताजा डोनेशन रिपोर्ट में प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट ही एकमात्र इलेक्टोरल ट्रस्ट दर्ज है। बड़े योगदानकर्ताओं में स्टार सीमेंट ने ₹5 करोड़ दिए। सज्जन भजांका ने ₹4 करोड़ और प्रेम कुमार भजांका ने ₹2 करोड़ का योगदान दिया। प्रूडेंट ट्रस्ट कंपनियों के चंदे का सबसे बड़ा कलेक्शन सेंटर है, जो पैसा इकट्ठा करके अपनी मर्जी से पार्टियों में बांटता है। पिछले 10 साल से इसका सबसे बड़ा फायदा BJP को मिलता रहा है। कुल आय का आंकड़ा आना अभी बाकी योगदान रिपोर्ट में कांग्रेस की कुल आय नहीं बताई गई है। कुल आय में छोटे चंदे, सदस्यता शुल्क, कूपन से मिली रकम और ब्याज भी शामिल होते हैं। कांग्रेस का 2025-26 का ऑडिटेड अकाउंट अभी अपलोड नहीं हुआ है। पार्टी की पूरी वित्तीय स्थिति जानने के लिए इस खाते की जरूरत होगी। 2024-25 में केवल कूपन से कांग्रेस को ₹350.12 करोड़ मिले थे। बीजेपी को पिछले वित्तीय वर्ष में मिला था ₹6000 करोड़ का चंदा बीजेपी को 2024-25 में ₹6,074.02 करोड़ मिले थे। यह कांग्रेस के चंदे से करीब 12 गुना ज्यादा था। 2025-26 के लिए बीजेपी का आंकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है। चुनाव आयोग ने पार्टी की योगदान रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की है। जिन 12 वित्तीय वर्षों का आंकड़ा देखा गया, उनमें हर साल बीजेपी को कांग्रेस से ज्यादा चंदा मिला। —————————- ये खबर भी पढ़ें… 5 राज्यों के चुनाव में भाजपा को ₹1,473 करोड़ चंदा: कांग्रेस से 7 गुना ज्यादा; असम में ₹96 करोड़ खर्च किए, 22 सीटें ज्यादा जीतीं असम, बंगाल, पुडुचेरी, केरलम और तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में BJP को कांग्रेस के मुकाबले 7 गुना ज्यादा चंदा मिला। 15 मार्च से 4 मई तक के चुनावी पीरिएड में BJP को 1,472.8 करोड़ रुपए, जबकि कांग्रेस को 207.17 करोड़ रुपए मिले। चुनाव आयोग ने यह आंकड़े बुधवार को जारी किए। केरलम और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में BJP का खर्च अभी सामने नहीं आया है। पढ़ें पूरी खबर…

लालकृष्ण आडवाणी का 99वां जन्मदिन आज:मोदी ने लिखा- बिना कड़वाहट शून्य से जिंदगी खड़ी की; अटलजी के साथ मिलकर भारतीय राजनीति की दिशा बदली

लाल कृष्ण आडवाणी का आज 99वां जन्मदिन है। पीएम मोदी ने उनके लिए विशेष चिट्‌ठी लिखी है। जिसमें उन्होंने उनके व्यक्तित्व और जीवनयात्रा के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा कि आडवाणीजी ने बिना कड़वाहट शून्य से जिंदगी खड़ी की। अटलजी के साथ मिलकर भारतीय राजनीति की दिशा बदली। उन्होंने लिखा- 8 नवंबर 1927 को देव दीपावली के दिन कराची में जन्मे आडवाणी का जीवन आधुनिक भारत के अनेक ऐतिहासिक अध्यायों का साक्षी रहा है। 1947 में विभाजन की त्रासदी ने उन्हें अपना घर और परिचित परिवेश छोड़ना पड़ा। प्रभु श्रीराम और दीपोत्सव के साथ जुड़ा यह दिन इसलिए भी विशेष है कि इसी वर्ष हम जनसंघ की स्थापना के 75 वर्ष, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती मना रहे हैं। आपातकाल में लोकतंत्र की रक्षा की, लेटर की 4 बड़ी बातें ‘सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, निजी जिंदगी में सादगी’ उन्होंने लिखा, आडवाणी जी ने अपने आचरण से हमेशा सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और शुचिता का उदाहरण प्रस्तुत किया है। जबकि, सादगी और संवेदनशीलता उनका एक विशेष पक्ष है। वे अध्ययनशील हैं, इतिहास, साहित्य, सिनेमा और रंगमंच में गहरी रुचि रखते हैं। उनकी पुस्तक ‘माई कंट्री माई लाइफ’ उनके अनुभवों और ऐतिहासिक दृष्टि का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। अपनी सिंधी संस्कृति से उनका जुड़ाव और सिंधु दर्शन को लोकप्रिय बनाने में उनका योगदान भी उल्लेखनीय है। उनकी इस लंबी यात्रा में कमला आडवाणी जी का योगदान भी अविस्मरणीय है। वे हर परिस्थिति में उनकी शक्ति और संबल बनी रहीं। राष्ट्र के प्रति उनके असाधारण योगदान के लिए वर्ष 2024 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके जीवनभर के राष्ट्रसेवा के समर्पण के प्रति देश की कृतज्ञता का प्रतीक है। मोदी ने बताईं 2 बातें पहली- उनकी वैचारिक स्पष्टता और बौद्धिक प्रखरता। उनके भाषण, लेखन और संसदीय हस्तक्षेप विचारों की गहराई और अभिव्यक्ति की सटीकता के उदाहरण हैं। दूसरी- छद्म धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध निर्भीकता से अपनी बात रखी और राष्ट्र प्रथम के विचार को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित किया। जनसंघ से लेकर भाजपा तक उन्होंने कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियां तैयार कीं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में संगठन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।