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मवेशियों की दवाओं से मरे करोड़ों गिद्ध:कानपुर में वाइल्डलाइफ साइंटिस्ट बोलीं-डाइक्लोफेनाक और एसीक्लोफेनाक घातक

कभी आसमान में करोड़ों की संख्या में नजर आने वाले गिद्ध यानी जटायु अब विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके हैं। मवेशियों को दी जाने वाली कुछ पेनकिलर दवाएं इनके लिए जानलेवा साबित हुईं। डाइक्लोफेनाक, एसीक्लोफेनाक और कीटोप्रोफेन जैसी दवाओं से दूषित मवेशियों के शव खाने के बाद गिद्धों की संख्या तेजी से घट गई। स्थिति यह है कि अब इन्हें ‘क्रिटिकली एंडेंजर्ड’ (अति गंभीर रूप से संकटग्रस्त) श्रेणी में रखा गया है। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) की वाइल्डलाइफ साइंटिस्ट अलका दुबे के मुताबिक, गिद्धों के संरक्षण के लिए बड़े स्तर पर काम चल रहा है। ब्रीडिंग सेंटरों में 700 से 800 गिद्धों का पालन-पोषण किया जा रहा है। इन्हें सुरक्षित तरीके से प्राकृतिक वातावरण में छोड़ने के लिए 100 किलोमीटर के दायरे में वल्चर सेफ जोन (गिद्धों के लिए सुरक्षित क्षेत्र) तैयार किए जा रहे हैं। 100 किमी के दायरे में दवाओं पर रोक अलका दुबे पिछले 17 वर्षों से जटायु संरक्षण पर काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि सिर्फ गिद्धों को ब्रीडिंग सेंटर में बचाना पर्याप्त नहीं है। जंगल में छोड़ने के बाद भी उन्हें सुरक्षित वातावरण मिलना जरूरी है। इसके लिए 100 किलोमीटर के दायरे में प्रतिबंधित पेनकिलर दवाओं के इस्तेमाल पर रोक सुनिश्चित की जाएगी। गिद्धों के घोंसलों और प्राकृतिक आवास के आसपास मानवीय दखल भी कम किया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, गिद्ध बेहद शर्मीले पक्षी हैं और इनके प्रजनन के लिए शांत वातावरण जरूरी है। तराई के 18 जिलों में बेहतर स्थिति देशभर में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट आई है। हालांकि उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र के 18 जिलों में स्थिति कुछ बेहतर बताई जा रही है। बहराइच, बलरामपुर, गोंडा, श्रावस्ती, महाराजगंज और गोरखपुर समेत इन क्षेत्रों में ऊंचे पेड़ों के कारण गिद्धों का प्राकृतिक आवास अपेक्षाकृत सुरक्षित है। इन इलाकों में गिद्धों की सर्वाइवल रेट करीब 3 से 4 प्रतिशत तक देखी गई है। 5 सितंबर को कानपुर जू में जागरूकता अभियान जटायु संरक्षण को लेकर लोगों और युवाओं को जागरूक करने के लिए 5 सितंबर को कानपुर प्राणि उद्यान में विशेष अवेयरनेस कैंप लगाया जाएगा। इसमें पर्यटकों, कॉलेज छात्रों और फॉरेस्ट ट्रेनीज को शामिल किया जाएगा। कार्यक्रम में पीपीटी प्रेजेंटेशन, रिसर्च मटेरियल और क्विज प्रतियोगिता के जरिए गिद्धों के संरक्षण की जानकारी दी जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि गिद्धों को बचाने के लिए दवाओं के इस्तेमाल पर प्रभावी रोक के साथ लोगों में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। सुरक्षित वातावरण मिलने पर ही जटायु की आबादी को दोबारा बढ़ाया जा सकेगा।

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