100 करोड़ की 38 बीघा सरकारी जमीन निजी घोषित:DDC कोर्ट के आदेश पर राज्य सरकार के नाम दर्ज, डीएम-एसपी ने की जांच
संभल में 100 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की 38 बीघा सरकारी जमीन को अवैध रूप से निजी भू-स्वामियों के नाम दर्ज कर बेचने का मामला सामने आया है। शिकायत के बाद हुई जांच में पता चला कि इस जमीन का व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा था। यह बेशकीमती ‘नवीन परती’ भूमि संभल-मुरादाबाद हाईवे पर स्थित है, जिसके चार प्लॉट नंबर एक साथ जुड़े हुए हैं। डीडीसी कोर्ट के आदेश पर अब खतौनी से निजी खातेदारों के नाम हटा दिए गए हैं और भूमि को राज्य सरकार तथा ग्राम सभा के नाम दर्ज कर दिया गया है। रविवार शाम करीब 4:30 बजे, जिलाधिकारी अंकित खंडेलवाल और पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बिश्नोई ने तहसील संभल के थाना रायसत्ती क्षेत्र के गांव तख्त गोसाईं का दौरा किया। उन्होंने गाटा संख्या 206, 207, 233, 242/378 और 279 में लगभग डेढ़ घंटे तक जांच की।
जिलाधिकारी ने बताया कि यह भूमि वर्ष 1954 में नगर पालिका परिषद संभल को प्रबंधन के लिए दी गई थी। इसके 13 साल बाद, वर्ष 1967 में, नगर पालिका परिषद ने कथित तौर पर कुछ पट्टेदारों को इस जमीन का पट्टा आवंटित कर दिया। प्रथम दृष्टया, नगर पालिका को प्रबंधन के लिए दी गई जमीन का पट्टा करने का अधिकार नहीं था, इसलिए यह पट्टा शुरू से ही शून्य था। इसके बाद यह जमीन पट्टेदारों के कब्जे में आ गई। वर्ष 1991 में, अपर तहसीलदार कोर्ट ने सईदउल्लाह सहित इन अवैध कब्जाधारियों को अवैध घोषित करते हुए उनकी बेदखली का आदेश दिया था। इसके बाद अपर जिलाधिकारी कोर्ट में अपील की गई, लेकिन वर्ष 1992 में वह अपील भी खारिज हो गई। कोर्ट ने कब्जाधारियों को अवैध मानते हुए इसे सरकारी जमीन घोषित किया था। इसके उपरांत, कब्जाधारियों द्वारा चकबंदी कोर्ट में वाद दायर किया गया। डीडीसी के स्तर से उन्हें पुनः सुनवाई का अवसर दिया गया। वर्ष 2005 में यह मामला फिर से चकबंदी अधिकारी के पास पहुंचा, जिन्होंने सुनवाई के बाद इसे ग्राम सभा की भूमि के रूप में यथावत रखने का आदेश दिया। 2005 के आदेश के विरुद्ध एसओसी के यहां अपील की गई। यह अपील भी खारिज हो गई और एक बार फिर इसे सरकारी जमीन मानते हुए राज्य सरकार की भूमि बताया गया। हालांकि, वर्ष 2008 में तत्कालीन डीडीसी प्रेम सिंह खड़क ने अपने क्षेत्राधिकार से परे जाकर और गलत तथ्यों के आधार पर इस जमीन को निजी खातेदारों का बता दिया। उन्होंने निजी खातेदारों को कब्जा दिए जाने के आदेश भी जारी कर दिए। डीएम ने बताया कि 2005 और 2008 में डीडीसी ने अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर इस सरकारी जमीन को निजी खातेदारों के नाम कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ नगर पालिका प्रबंधन ने हाईकोर्ट में अपील दायर करने का प्रयास किया। अपील दाखिल भी हुई, लेकिन 2013 में तत्कालीन ईओ राजकुमार गुप्ता ने हाईकोर्ट में एक आवेदन दायर कर कहा कि नगर पालिका इस मामले में पैरवी करने की इच्छुक नहीं है। इसके बाद यह मामला कई स्तरों पर जांच के दायरे में आया। डीएम ने कहा कि हाल ही में जब यह प्रकरण अधिकारियों के संज्ञान में आया, तो 1954 से अब तक की पूरी जांच कराई गई। जांच में पाया गया कि यह जमीन ‘नवीन परती’ की है और इसका उपयोग अलग-अलग समय पर गलत लोगों द्वारा व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया गया था। तत्काल संज्ञान लेते हुए एक टीम का गठन किया गया। चूंकि डीडीसी कोर्ट के आदेश से खातेदार दर्ज किए गए थे, इसलिए डीडीसी कोर्ट में पुनर्स्थापना (रिस्टोरेशन) याचिका दायर की गई। यह सुनिश्चित किया गया कि मामले की सुनवाई प्रतिदिन हो। डीएम के अनुसार सुनवाई रोकने के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कुछ लोगों द्वारा प्रयास भी किए गए। अंततः, डीडीसी कोर्ट ने राज्य सरकार के पक्ष में निर्णय सुनाया। इस क्रम में, खतौनी से उन खातेदारों के नाम तुरंत हटाकर राज्य सरकार और ग्राम सभा का नाम ‘नवीन परती’ के अंतर्गत दर्ज किया गया। उन्होंने बताया कि तत्कालीन ईओ, उस समय के नगर पालिका के मानचित्र बनाने वाले कर्मी, 2005 और 2008 के डीडीसी, बैनामा कराने वाले सभी संबंधित व्यक्तियों और मूल पट्टेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जा रही है। विभागीय कर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी की जा रही है।

